टंडनजी का जाना …. 

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डॉ दिग्विजय सिंह, वरिष्ठ पत्रकार
डॉ दिग्विजय सिंह, वरिष्ठ पत्रकार
मध्य प्रदेश के राज्यपाल लालजी टंडन का मंगलवार की सुबह निधन हो गया। टंडन जी के पुत्र आशुतोष टंडन के एक संदेश से सबको टंडन जी के चले जाने की जानकारी हुई। आनन-फानन में समाचार चैनलों में यह खबर फ्लैश होने लेगी तो मैं भी पिछली घटनाओं के फ्लैश बैक में उतर गया। उनके जुडी तमाम स्मृतियाँ जेहन में सजीव होने लगी। टंडन जी को मैंने बहुत करीब से जाना। वह सरल स्वभाव के शालीन व्यक्ति थे। प्रदेश बीजेपी के वह एक मात्र ऐसे नेता थे, जिनका बिना बैठकी गप्प के दिन ही पूरा नही होता था। लखनऊव्वा तहजीब के चितेरे टंडन जी पार्टी और राजनीति से ऊपर लखनऊ के ऐसे अंतिम नेता थे जिनका हिन्दू और मुसलमान समान भाव से आदर करते थे। टंडन जी का जाना राजनीतिक संस्कारवान, विनम्र, स्वभाव से पूरी तरह लोकतांत्रिक, विकास को समर्पित और गरीबों के हमदर्द नेता का जाना है। सूबे के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी उन्हें विशिष्ट कार्य-संस्कृति का जनक बताते रहे हैं।
ऐसे लालजी टंडन का राजनीतिक करियर पार्षद बनने से शुरू हुआ था। उनके राजनीतिक करियर में कई उतार-चढ़ाव आए। जिनका उन्होंने अपनी विनम्र शैली में मुकाबला किया। लालजी टंडन के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी से बहुत करीबी संबंध थे। लालजी टंडन अटलजी को लेकर कहते थे कि वह उनके दोस्त, पिता और भाई सब थे। एक मुलाकात के दौरान टंडन जी ने बताया था कि वर्ष 1952, 1957 और 1962 तक लगातार तीन चुनाव में मिली हार ने अटल जी का दिल लखनऊ से खट्टा कर दिया था। 1991 में उन्होंने यहां से चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया था। जब लालजी टंजन ने वजह पूछी तो उन्होंने हंसते हुए कहा था कि अभी भी कुछ बताने को बचा है क्या? तो लालजी टंडन ने उन्हें चुनाव लड़ने की जरूरत बताई और इसके साथ ही उन्हें भरोसा दिया कि लखनऊ अब उनके साथ है। वह सिर्फ नामांकन भरने के लिए आएं, बाकी चुनाव हम पर छोड़ दें। अटल जी तैयार हो गए और वह यह चुनाव जीते भी। लखनऊ में अटल जी के खाने आदि का सारा प्रबंध टंडन जी ही देखते थे। अटल जी को क्या पसंद है और क्या नही यह उन्हें मालूम था। वर्षो तक उन्होंने लखनऊ से अटल जी के लिए उनकी पसंदीदा मिठाई भेजवायी।
ऐसे लालजी टंडन का जन्म रामनवमी की सुबह 12 अप्रैल, 1935 में लखनऊ में हुआ था। जिस घर में उनका जन्म हुआ था, वह एक जमीदार परिवार था। वह उस घर के सबसे छोटे सदस्य थे। आठ भाई बहन और माता पिता। बनी बनायी रह चलने की पूरी सहूलियत उनके सामने थी, लेकिन इस राह को उन्होंने नही अपनाया। अपने शुरुआती जीवन में ही लालजी टंडन आरएसएस से जुड़ गए थे। सात साल की उम्र में ही उन्होंने संघ की शाखा में जाना शुरू कर दिया था। उन्होंने स्नातक कालीचरण डिग्री कॉलेज लखनऊ से किया। लालजी टंडन की शादी 26 फरवरी 1958 कृष्णा टंडन से हुई। लालजी टंडन के तीन बेटे हैं। इनमें से आशुतोष टंडन जिन्हें गोपालजी टंडन भी कहा जाता है योगी सरकार में मंत्री हैं। संघ से अपने जुडाव और अटल जी से नजदीकी होने का किस्सा टंडन जी बहुत तलीनता के साथ सुनते थे।
टंडन जी के बताये गए किस्से के अनुसार, संघ से जुड़ने के दौरान ही  उनकी मुलाकात पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से हुई। धीरे-धीरे वह अटलजी के बहुत करीब आ गए। लालजी टंडन खुद कहते थे कि अटल बिहारी वाजपेयी ने राजनीति में उनके साथी, भाई और पिता तीनों की भूमिका निभाई। लालजी टंडन ने अपना राजनीतिक करियर 1960 से शुरू किया। वह दो बार सभासद चुने गए। दो बार विधान परिषद के सदस्य बने। वह इंदिरा गांधी की सरकार के खिलाफ जेपी आंदोलन से जुड़े और यहीं से उनके राजनीतिक सफर को उड़ान मिली।
उत्तर प्रदेश बीजेपी में लालजी टंडन ही एक ऐसे नेता थे जिनका विपक्षी दलों के नेता भी बहुत सम्मान करते थे। बसपा मुखिया मायवती तो उन्हें भाई मानती थी। मुलायम सिंह यादव भी उनका सम्मान करते थे। 90 के दशक में उत्तर प्रदेश में बनी बीजेपी और बीएसपी की सरकार में उनका अहम रोल था। लालजी टंडन की पहल पर ही बसपा ने बीजेपी से गठबंधन किया। 1978 से 1984 तक और फिर 1990 से 96 तक लालजी टंडन दो बार यूपी विधानपरिषद के सदस्य रहे। 1991 में वह यूपी के मंत्री पद पर भी रहे। वर्ष 1996 से 2009 तक लगातार तीन बार विधायक का चुनाव जीते। 1997 में वह नगर विकास मंत्री रहे। तब उनके ही प्रयास से दस वर्षों से अधर में लटका शहीद पथ प्रोजेक्ट शुरू हो सका था। 2009 में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के बाद लखनऊ की लोकसभा सीट खाली हुई तो लालजी टंडन ने यहां से चुनाव लड़ा। फिर राजनाथ सिंह के लिए उन्होंने इस सीट को छोड़ दिया। वर्ष 2018 में उन्हें बिहार का राज्यपाल और फिर बाद में मध्य प्रदेश का राज्यपाल बनाया गया। इस पद पर रहते हुए ही उन्होंने अंतिम सांस ली।
लालजी टंडन के  मीडिया के लोगों में भी बहुत लोकप्रिय थे। लखनऊ के मीडियाकर्मी उन्हें बाबूजी कहते थे। बीजेपी में  पार्टी प्रवक्ता के रुप में उन्होंने जो छाप छोडी उसकी मिसाल मिलना मुश्किल है। ऐसे दौर में उन्होंने पार्टी के प्रवक्ता रहे जब तमाम राजनीतिक दल बीजेपी के खिलाफ थे। तब तमाम तरह के आरोप बीजेपी पर लगाये जाते थे और टंडन जी विपक्ष के हर आरोप का बड़ी शालीनता के साथ जवाब देकर विपक्ष को निरुत्तर कर देते थे। टंडन जी खाने पीने के शौक़ीन थे। उन्हें चाट बहुत पसंद थी। आये दिन वह पार्टी नेताओं और पत्रकारों के लिए घर पर चाट पार्टी का आयोजन करते थे। जिसमें राजनीतिक गप्पशप होती थी। दिल्ली से लेकर देश के अन्य राज्यों की राजनीति पर वह खुलकर चर्चा करते थे। और तमाम नए पुराने किस्से सुनाते थे। बीजेपी में बदले राजनीतिक माहौल में भी टंडन जी अपनी पुरानी शैली को जारी रखे हुए थे। उनके जाने से अब उनकी इस परंपरा को कौन जारी रखेगा? या सवाल उन्हें याद करते हुए अब पूछा जा रहा है।

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