‘मन की बात’ की 47वीं कड़ी में प्रधानमंत्री के संबोधन का मूल पाठ

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नई दिल्ली, 26 अगस्त । आज पूरा देश रक्षाबंधन का त्योहार मना रहा है। सभी देशवासियों को इस पावन पर्व की बहुत-बहुत शुभकामनाएं। रक्षाबंधन का पर्व बहन और भाई के आपसी प्रेम और विश्वास का प्रतीक माना जाता है। यह त्यौहार सदियों से सामाजिक सौहार्द्र का भी एक बड़ा उदाहरण रहा है। देश के इतिहास में अनेक ऐसी कहानियाँ हैं, जिनमें एक रक्षा सूत्र ने दो अलग-अलग राज्यों या धर्मों से जुड़े लोगों को विश्वास की डोर से जोड़ दिया था। अभी कुछ ही दिन बाद जन्माष्टमी का पर्व भी आने वाला है। पूरा वातावरण हाथी, घोड़ा, पालकी – जय कन्हैयालाल की, गोविन्दा-गोविन्दा की जयघोष से गूँजने वाला है। भगवान कृष्ण के रंग में रंगकर झूमने का सहज आनन्द अलग ही होता है। देश के कई हिस्सों में और विशेषकर महाराष्ट्र में दही-हांडी की तैयारियाँ भी हमारे युवा कर रहे होंगे। सभी देशवासियों को रक्षाबन्धन एवं जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएँ।
‘प्रधानमन्त्री-महोदय! नमस्कारः। अहं चिन्मयी, बेंगलुरु-नगरे विजयभारती-विद्यालये दशम-कक्ष्यायां पठामि। महोदय अद्य संस्कृत-दिनमस्ति। संस्कृतंभाषां सरला इति सर्वे वदन्ति। संस्कृतं भाषा वयमत्र वह:वह:अत्र: सम्भाषणमअपि कुर्मः। अतः संस्कृतस्य महत्व: -विषये भवतः गह: अभिप्रायः इति रुपयावदतु। ’
भगिनी ! चिन्मयि !!
भवती संस्कृत – प्रश्नं पृष्टवती।
बहूत्तमम् ! बहूत्तमम् !!
अहं भवत्या: अभिनन्दनं करोमि।
संस्कृत –सप्ताह – निमित्तं देशवासिनां
सर्वेषां कृते मम हार्दिक-शुभकामना:
मैं बेटी चिन्मयी का बहुत बहुत आभारी हूँ कि उसने यह विषय उठाया। साथियो ! रक्षाबन्धन के अलावा श्रावण पूर्णिमा के दिन संस्कृत दिवस भी मनाया जाता है। मैं उन सभी लोगों का अभिनन्दन करता हूँ, जो इस महान धरोहर को सहेजने, सँवारने और जनसामान्य तक पहुँचाने में जुटे हुए हैं। हर भाषा का अपना माहात्म्य होता है। भारत इस बात का गर्व करता है कि तमिल भाषा विश्व की सबसे पुरानी भाषा है और हम सभी भारतीय इस बात पर भी गर्व करते हैं कि वेदकाल से वर्तमान तक संस्कृत भाषा ने भी ज्ञान के प्रचार-प्रसार में बहुत बड़ी भूमिका निभाई है।

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