अंतरराष्ट्रीय तीरंदाज जयंतीलाल ननोमा का सड़क दुर्घटना में निधन

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डूंगरपुर, 01 जून । अंतरराष्ट्रीय तीरंदाज और डूंगरपुर के जिला खेल अधिकारी जयंतीलाल ननोमा की रविवार देर रात को एक सड़क दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल होने के बाद उदयपुर अस्पताल में इलाज के दौरान मौत हो गई। हादसे में उनके साथ कार में मौजूद एक पीटीआई कांतिलाल घायल हो गए, जिसका सागवाड़ा के एक निजी अस्पताल में इलाज चल रहा है। जयंतीलाल की मौत का समाचार मिलते ही वागड़ क्षेत्र सहित खेल जगत से जुड़ी हस्तियों और खिलाड़ियों में शोक की लहर छा गई है।
 
जानकारी के अनुसार अंतरराष्ट्रीय तीरंदाज और जिला खेल अधिकारी जयंतीलाल ननोमा अपने साथी फलोज स्कूल के शारीरिक शिक्षक कांतिलाल के साथ रविवार को बांसवाड़ा जिले के बागीदौरा गए थे, जहां से चावल लेकर वापस लौटे रहे थे इसी दौरान वरदा थाने से आगे निकलते ही पुलिए के पास उनकी स्कॉर्पियो कार अनियंत्रित होकर पलट गई। हादसे में जयंतीलाल के सिर पर गंभीर चोट लगने से खून ज्यादा बह गया। घटना की जानकारी मिलने पर वरदा थानाधिकारी मय जाब्ता मौके पर पहुंचे तथा जयंतीलाल और कांतिलाल दोनों को सागवाड़ा के एक निजी अस्पताल में ले जाकर भर्ती करवाया, जहां जयंतीलाल की हालत नाजुक होने पर उदयपुर के लिए रेफर कर दिया। उदयपुर में इलाज के दौरान जयंतीलाल की मौत हो गयी। जयंतीलाल की मौत की खबर जैसे ही डूंगरपुर और खेल जगत से जुड़ी हस्तियों तक पंहुची तो शोक की लहर छा गई। जयंतीलाल के शव को अब उदयपुर से डूंगरपुर लाया जाएगा। जयंतीलाल के पैतृक गांव बिलड़ी में दाह संस्कार किया जाएगा। 
 
तीन बार भारतीय तीरंदाजी टीम के रहे कोच :-
 
जयंतीलाल की राज्य, राष्ट्र व विश्व स्तर की प्रतियोगिताओं में उनकी सफलताएं भी गर्व करने का अवसर प्रदान करती हैं। वर्ष 2009 में ही उन्होंने 9 गोल्ड मेडल जीते जबकि 2010 में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए एक गोल्ड और दो सिल्वर मेडल हासिल किए। उनकी उपलब्धियों व योग्यता को देखते हुए 2013 में उन्हें भारतीय तीरंदाजी टीम का राष्ट्रीय कोच बनाया गया जिस पद पर वे 2015 तक रहे, उनके साथ 16 तीरंदाजों की टीम साउथ अमेरिका के कोलंबिया में आयोजित वर्ल्ड कप तीरंदाजी स्पर्धा में भाग लिया। इसके बाद 2018 में तीसरी बार फिर भारतीय टीम के कोच बने। 2019 में भी उन्हें तीरंदाजी टीम का कोच बनाया गया था, लेकिन प्रतियोगिता स्थगित हो जाने के कारण नहीं जा पाए थे। उन्हें प्रतिष्ठित गुरु वशिष्ठ और महाराणा प्रताप पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था।
 

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