सामने आया संघ का नजरिया : दिव्य उत्कर्ष

सामने आया संघ का नजरिया : दिव्य उत्कर्ष

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दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित व्याख्यानमाला ‘भविष्य का भारत : संघ का दृष्टिकोण’ के आयोजन से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने पूरी दुनिया के सामने विभिन्न विषयों पर अपनी नीतियों, उद्देश्यों और कार्य प्रणाली पर विस्तार से प्रकाश डाला है। संघ के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है, जब संघ प्रमुख ने हर वर्ग और हर विचारधारा के लोगों को आमंत्रित किया, अपनी बातें रखी और उन्हें प्रश्न पूछने के लिए आमंत्रित किया। नागपुर में 1925 में शुरू हुए संघ पर हमेशा ही आरोप लगता रहा है कि वह एक बंद दायरे में काम करने वाला संगठन है। ऐसा कहने की वजह यही थी कि संघ ने कभी खुद पर लगाये जाने वाले अनर्गल आरोपों को लेकर भी प्रतिवाद नहीं किया। समय-समय पर संघ पर कई तरह के आरोप लगाए जाते रहे, लेकिन संघ के कार्यकर्ता आरोपों की चिंता किये बिना लगातार अपना काम करते रहे।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार संघ की स्थापना काल से ही प्रचार माध्यमों से दूर रहना बेहतर समझते थे। उनका मानना था किस संघ का मूल उद्देश्य राष्ट्र कार्य में लगे रहना और समाज को एकजुट करना है। प्रचार माध्यमों से जुड़ने से संघ को प्रसिद्धि जरूर मिल सकती है, लेकिन जितनी ऊर्जा प्रचार कार्यों में लगेगी, उसका उपयोग राष्ट्र कार्य में लगाया जाना ज्यादा बेहतर है। डॉक्टर हेडगेवार के बाद दूसरे सरसंघचालक गुरु जी और तीसरे सरसंघचालक बाला साहब देवरस ने भी इसी नीति का अनुपालन किया। इसका परिणाम यह हुआ कि संघ पर राजनीतिक तथा सामाजिक वजहों से कई तरह के आरोप लगाये जाते रहे, लेकिन स्वयंसेवकों ने कभी भी उन आरोपों की परवाह नहीं की। वे सिर्फ अपने काम में लगे रहे। प्राकृतिक आपदाओं से लेकर राष्ट्रीय सुरक्षा के कई अवसरों पर संघ के स्वयंसेवकों ने जान की परवाह किए बगैर दिन रात काम किया। इसकी मुक्तकंठ से भले ही अन्य लोगों ने प्रशंसा की, लेकिन संघ ने खुद आगे बढ़कर अपने क्रियाकलापों का श्रेय लेने की कोशिश नहीं की।
संघ के कामकाज और उसकी बढ़ती लोकप्रियता से उसके विरोध में खड़े हुए लोग लगातार आरोप लगाते रहे लेकिन संघ ने कभी भी उन आरोपों का खंडन नहीं किया। इसलिए जनसामान्य में ये भावना बनने लगी कि संघ पर लगने वाले आरोपों में कुछ तो सच्चाई होगी ही। यही कारण है कि जब प्रोफेसर राजेंद्र सिंह, जिन्हें रज्जू भैया के नाम से ज्यादा जाना जाता है, संघ के सरसंघचालक बने तो उन्होंने पहली बार संघ की ओर से मीडिया में अपनी बात रखने की परंपरा शुरू की। उन्होंने संघ कार्य को प्रचार से जोड़ने का काम शुरू किया। पांचवें सरसंघचालक केसी सुदर्शन के समय संघ थोड़ा और मीडिया फ्रेंडली हुआ। और अब संघ ने पहली बार लोगों की जिज्ञासाओं व शंकाओं का समाधान करने के लिए तीन दिन की व्याख्यानमाला का आयोजन किया। भारत के भविष्य को लेकर अपना नजरिया बताने की यह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की बड़ी पहल थी। तीन दिन के इस कार्यक्रम में देश विदेश से आमंत्रित लोगों के सामने सरसंघचालक मोहन भागवत ने यह स्पष्ट करने की कोशिश की कि भारत के भविष्य से जुड़े तमाम पहलुओं पर संघ की सोच क्या है।
राजनीति से जुड़े तथा बौद्धिक होने का दावा करने वाले कई लोगों ने इस आयोजन के समय को लेकर सवाल भी उठाये। लेकिन ऐसी बातों का कोई महत्व नहीं है। महत्व की बात ये है कि देश के सबसे पुराने सामाजिक संगठनों में से एक, जिसकी पहुंच आज पूरे देश में ब्लॉक स्तर तक हो चुकी है, देश के कोने-कोने में इसकी शाखाएं लग रही हैं, उसने अपनी ओर से पहल करते हुए तमाम ज्वलंत मसलों पर अपनी राय, अपना दृष्टिकोण बताने की कोशिश की। यह संभव है कि संघ की राय से कोई सहमत हो तो कोई असहमत, लेकिन देश के विकास को लेकर, संसाधनों के बंटवारे को लेकर, देश के भविष्य को लेकर जिस तरह संघ ने अपनी राय रखी, उस तरह से किसी भी अन्य संघ विरोधी या उसके आलोचक संगठन ने शायद ही आज तक रखी हो।
सच तो यह है कि इस कार्यक्रम में संघ ने अपनी नीतियों, उद्देश्यों और कार्यों को लेकर जितनी विस्तार से जानकारियां दी, उसके बाद संघ को जाने समझे बिना उसे एक दायरे में बांधकर रखने वाले लोगों को अपनी सोच बदल लेनी चाहिए। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की इस बात के लिए भी प्रशंसा की जानी चाहिए कि इस कार्यक्रम में उसने न केवल अपने आलोचकों को, बल्कि अपने विरोधियों को भी आमंत्रण भेजा। कार्यक्रम में शामिल होने वाले लोगों के सवालों के जवाब भी दिये। यह अलग की बात है कि संघ को पानी पी-पीकर कोसने वाले राजनीतिक दलों ने आमंत्रण मिलने के बावजूद कार्यक्रम के बहिष्कार करने का ऐलान किया। जबकि वे भी इस कार्यक्रम में शामिल होकर अपने तमाम आरोपों को संघ प्रमुख के सामने अपने सवाल के रूप में रख सकते थे। लेकिन अगर वे ऐसा करते तो उनकी अपनी राजनीति ही इससे मार खाती। इन आलोचकों के कार्यक्रम में आने से इनकार करने से यह भी स्पष्ट हो गया की ये लोग संघ को आगे भी एक बंद नजरिये से ही देखते रहेंगे। संघ ने अपने काम करने के तरीके में बदलाव करते हुए सबको आमंत्रित किया, लेकिन संघ विरोधियों ने अपने खोल में दुबके रहना ही बेहतर समझा।
मोहन भागवत ने एक बात खुले तौर पर कही कि संघ को जानने का यह अर्थ कतई नहीं है कि सभी लोग संघ का अनुसरण करें। निश्चित रूप से इस बात को समझना होगा कि संघ को जाने-समझे बगैर या संघ का पक्ष सुने बगैर अगर कोई इसे राष्ट्र विरोधी या समाज विरोधी कहता है या फिर जातिवादी, संप्रदायवादी आदि की संज्ञा देता है, तो ऐसा करके वह देश की जनता को मूर्ख बनाने की ही कोशिश करता है। संघ प्रमुख ने हिंदू, हिंदुत्व और भारतीयता इन तमाम विषयों पर संघ की सोच को स्पष्ट रूप से सामने रखा। उन्हें साफ-साफ कहा कि संघ का हिंदू राष्ट्र पर विश्वास है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि यहां मुसलमानों के रहने के लिए जगह नहीं है। क्योंकि संघ की दृष्टि में देश का हर नागरिक हिंदू है। सब एक-दूसरे के बराबर हैं। कोई किसी का शत्रु नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि अगर कोई खुद को हिंदू नहीं बल्कि भारतीय कहता है तो इस पर भी संघ को कोई आपत्ति नहीं है। ऐसा कहकर कि उन्होंने संघ पर मुस्लिम विरोधी होने के आरोप का भी स्पष्ट जवाब दे दिया।
इस क्रम में सरसंघचालक मोहन भागवत ने हिंदू और हिंदुत्व पर जोर देने की वजह का भी उल्लेख किया। स्वाभाविक रूप से उनकी बातों से संघ और हिंदुत्व को लेकर समाज में फैलाई जा रही भ्रांतियों का काफी हद तक निराकरण हो सकेगा। हालांकि संघ विरोधी इसे समझ पायेंगे, इसमें संदेह ही है। फिर भी यह स्पष्ट है कि समाज के बीच संघ को लेकर एक साफ संकेत गया है। संघ के इस कार्यक्रम का उद्देश्य हर व्यक्ति को अपनी बातों से सहमत करना ही था, ऐसी बात भी नहीं है, लेकिन संघ ने अपनी सोच के बारे में पूरे देश के साथ ही पूरी दुनिया को स्पष्ट जानकारी दे दी है। संघ को भविष्य में भी इस तरह के आयोजन करते रहना चाहिए, ताकि उसका नजरिया हमेशा स्पष्ट रहे और लोगों को उसके बारे में क्रियाकलाप और नीतियों को जानने का मौका मिलता रहे। यदि ऐसा हो सका, तभी भविष्य में संघ कार्य का और भी तेजी से विस्तार हो सकेगा तथा उसको लेकर चल रहे दुष्प्रचार का निराकरण हो सकेगा।

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