इमरान के सिर सजा कांटों का ताज : दिव्य उत्कर्ष

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    इमरान खान पाकिस्तान के 22वें प्रधानमंत्री बन गये हैं। 25 जुलाई को पाकिस्तान की नेशनल असेंबली के लिए हुए चुनाव में इमरान की पार्टी देश की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी। छोटे दलों और निर्दलीय सांसदों के समर्थन से प्रधानमंत्री बने इमरान ने एक बार फिर देश में बदलाव लाने की बात दोहरायी है और साफ कहा है कि जिन लोगों ने देश को लूटा है, उनको माफ नहीं किया जायेगा। वो कायदे आजम मोहम्मद अली जिन्ना के सपनों का पाकिस्तान बनाना चाहते हैं, लेकिन आजादी के बाद से अभी तक के सफर में पाकिस्तान जिन्ना के सपनों से काफी दूर जा चुका है। ऐसे में इमरान कैसे पाकिस्तान को पटरी पर लाने में सफल होंगे, यह देखने वाली बात होगी।
    चुनाव के पहले इमरान खान भारत के खिलाफ जमकर बयानबाजी की थी। भारत को पाकिस्तान का सबसे बड़ा दुश्मन बताते हुए उन्होंने नवाज शरीफ को उन्होंने नरेंद्र मोदी का एजेंट तक करार दिया था। भारत के खिलाफ आग उगलने में वे कभी भी पीछे नहीं रहे। ऐसे में भारत के साथ उनका संबंध कैसा रहेगा, यह देखना एक बड़ी बात होगी। भारत-पाक संबंधों के बीच बनी दरार को भरना आसान नहीं है। उड़ी हमले और तमाम आतंकी गतिविधियों की वजह से भारत और पाकिस्तान के बीच लगातार तनाव बना हुआ है। इसी तनाव की वजह से भारत ने 2016 में पाकिस्तान में होने वाले सार्क सम्मेलन का बहिष्कार करने का फैसला किया था। इसकी वजह से पूरी दुनिया में पाकिस्तान को काफी किरकिरी हुई थी। इन हालातों में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के रूप में इमरान खान के लिए सबसे बड़ी चुनौती भारत के साथ संबंध सुधारने की होगी। लेकिन सेना के बल पर चुनाव जीतने वाले इमरान के लिए ऐसा करना आसान नहीं होगा। क्योंकि पाकिस्तान की सेना कभी भी भारत से अच्छे संबंध बनाए रखने की पक्षधर नहीं रही है। ऐसे में भारत-पाकिस्तान संबंध इमरान के लिए एक बड़ी चुनौती रहेगी।
    इमरान खान के लिए एक बड़ी चुनौती अमेरिका के साथ अपने संबंधों को सुधारने की भी होगी। अमेरिका लंबे समय से पाकिस्तान का सरपरस्त बना रहा है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में पाकिस्तान और अमेरिका के संबंधों में काफी खिंचाव की स्थिति बन गयी है। नवाज शरीफ के पहले कार्यकाल तक पाकिस्तान और अमेरिका के संबंध काफी अच्छे थे। बाद में अमेरिका में जब तक बाराक ओबामा राष्ट्रपति रहे, तब तक भी आतंकवाद के खिलाफ लड़ने के नाम पर अमेरिका पाकिस्तान की लगातार मदद करता रहा। लेकिन ओबामा के कार्यकाल के आखिरी दिनों में ही दोनों देशों के संबंधों में कड़वाहट दिखने लगी थी। इसके बाद डोनाल्ड ट्रंप के अमेरिकी राष्ट्रपति बनने के बाद दोनों देशों के संबंधों में काफी बदलाव आ गया है।
    ट्रंप प्रशासन ने न केवल पाकिस्तान को दी जाने वाली आर्थिक मदद को न्यूनतम कर दिया है, बल्कि आतंकवाद का पोषण करने का आरोप लगाते हुए पाकिस्तान की कड़ी आलोचना भी की है। ऐसे में इमरान खान के सामने एक बड़ी चुनौती अमेरिका के साथ अपने संबंधों को सुधारने की भी होगी, ताकि उसे पहले की तरह ही अमेरिका की सरपरस्ती मिलती रहे। हालांकि पाकिस्तान ने जिस तरह से चीन के सामने समर्पण करने की मुद्रा बनायी है और चीन अमेरिका को चुनौती दे रहा है, वैसे में पाकिस्तान के लिए अमेरिका के साथ फिर से सहज संबंध कायम कर पाना आसान नहीं होगा। वैसे भी इमरान खान ने जीत के तुरंत बाद अपने पहले भाषण में ही स्पष्ट कर दिया था कि वे अमेरिका की बजाये चीन समर्थक नीतियों का अनुपालन करना ज्यादा पसंद करेंगे।
    इमरान के लिए एक बड़ी चुनौती पाकिस्तान में चल रहे आतंकवाद को काबू करने की भी होगी। आतंकवाद को बढ़ावा देने की वजह से पूरी दुनिया में उसकी काफी किरकिरी हो चुकी है। मौजूदा समय में पूरी दुनिया में आतंकवाद एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है। वहीं पाकिस्तान पर लंबे समय से आरोप लगता रहा है कि वह आतंकियों को पूरी मदद मुहैया कराता है। पाकिस्तान की सेना आतंकवादियों को न केवल प्रशिक्षण देती है, बल्कि उन्हें सुरक्षित ठिकाना भी उपलब्ध कराती है। ओसामा बिन लादेन के पाकिस्तान में मारे जाने के बाद तथा हाफिज सईद और मौलाना फजलुल्लाह जैसे अंतरराष्ट्रीय आतंकवादियों को मिले शरण की वजह से पाकिस्तान पूरी तरह से बेनकाब हो चुका है। बाराक ओबामा के शासनकाल में अमेरिका ने लंबे समय तक पाकिस्तान को आतंकवाद से संघर्ष करने के लिए आर्थिक मदद दी थी, लेकिन बाद में अमेरिका ने खुद इस बात को स्वीकार किया कि उस आर्थिक मदद का उपयोग पाकिस्तान ने आतंकियों को बढ़ावा देने में ही किया।
    इमरान खान के लिए सबसे बड़ी परेशानी पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था भी है। पाकिस्तान का विदेशी मुद्रा भंडार लगभग खाली हो चुका है। पिछले साल मई में पाकिस्तान के विदेशी मुद्रा भंडार में 16.4 अरब डॉलर की राशि थी, जो जुलाई 2018 में घटकर 10.3 अरब डॉलर रह गयी है। पाकिस्तानी रुपये का भी काफी अवमूल्यन हो चुका है। वहां का व्यापार घाटा 25 अरब डॉलर के सर्वतर तक पहुंच चुका है। महंगाई आसमान पर है और वहां के केंद्रीय बैंक को ब्याज दरों में भी बढ़ोतरी करना पड़ा है। इसी तरह चीन से लिया गया कर्ज भी पांच अरब डॉलर तक पहुंच गया है। अभी स्थिति ये है कि पुराने कर्जों के भुगतान करने के लिए भी पाकिस्तान को चीन का मुंह देखना पड़ रहा है। पाकिस्तान पुराने कर्जों के ब्याज का भुगतान करने की स्थिति में भी नहीं है। ऐसे में पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाना इमरान खान के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती होगी।
    इमरान भले ही पाकिस्तान के नये प्रधानमंत्री बन गये हैं, लेकिन यह पद उनके लिए कांटों की शैय्या ही साबित होने वाला है। पाकिस्तान का आयात पहले की तुलना में काफी बढ़ गया है, जबकि निर्यात के मोर्चे पर पाकिस्तान काफी पिछड़ा हुआ है। विश्व बैंक ने पिछले साल अक्टूबर में ही पाकिस्तान को चुनौती दी थी चेतावनी दी थी कि उसे कर्ज का भुगतान करने और करंट अकाउंट के घाटे को खत्म करने के लिए 17 अरब डॉलर की जरूरत पड़ेगी, लेकिन इस पैसे की व्यवस्था कैसे होगी इसका कोई भी रोडमैप नहीं बन सकता है। ऐसे में जरूरी है की इमरान खान सबसे पहले अपने पड़ोसियों के साथ संबंध सुधारें, आतंकवाद पर लगाम लगाएं और देश की अर्थव्यवस्था को दुरुस्त करने की दिशा में ध्यान दें।
    हालांकि सेना उन्हें ऐसा करने देगी, इसकी उम्मीद काफी कम है। ऐसे भी आज तक पाकिस्तान में कोई भी प्रधानमंत्री अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सका है। अगर इमरान खान सेना के आगे समर्पण की मुद्रा में रहकर अपना कार्यकाल पूरा करना चाहते हैं, तो निश्चित रूप से वे अपने देश को तबाही की ओर ले जायेंगे। वहीं अगर वे देश को बचाने के लिए सेना के प्रति बगावती रुख अपनाते हैं, तो संभव है कि सेना ही उन्हें सत्ता से धकेल दे। इसके बावजूद उम्मीद की जानी चाहिए कि इमरान खान अपने देश के हित में कठोर फैसला देने की कोशिश करेंगे। यही पाकिस्तान के लिए भी और उनके मित्र देशों के लिए भी अच्छा होगा।

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